Sunday, 9 May 2010

सीखने की कीमत

सुना था , ठोकर खाने के बाद ही संभलना सीखते हैं ,
पर क्या एक सीख के खातिर ठोकर खाना ज़रूरी है ?


कहते हैं की हार के बाद ही जीत है ,
पर अगर ये हार आंखरी हुई तो ? 
ऐसी सीख का क्या फायदा ?
क्यों न कुछ ऐसा करें की ठोकर   लगे ही ना ,
क्यों ना ऐसे  लड़े की हार मिले ही ना |


एक अदद सीख की कीमत ,एक चोट ,एक हार , क्या ज्यादा नहीं ?
सीखना ही है तो सीखो किसी और की हार से ,किसी और की चोट खाने से |
क्या फायदा उस सीख का जो मिलेगी अपनी जान गवाने से |


पर शायद यही सच भी है ,
क्यों कि मैंने भी सीखा है ,
अपनी ही चोट से ,अपनी ही  हार से |


पर मैं भी कब तक हारता रहूँ ,कब तक चोट खाता रहूँ ?
लड़ाई एक तरह की ही हो तो मैं कुछ  सीखूं |
यहाँ तो हर पल एक नई जंग छिड़ती है ,
हर क्षण एक ठोकर लगती है |


तो क्या मैं घायल होता रहूँ , बस ये जानने के लिए की संभलते कैसे हैं ?
और हारता रहूँ जीत के एक सबक के लिए ??





3 comments:

  1. Bahut Badhiya yogesh... Sundar likha hai... badhai... isi tarah sochte raho aur likhte raho.....

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  2. Acchaa Pryash......lekhna jaari rakhieyga..ye gujarish hae

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