Wednesday, 26 May 2010

..........GOD..............

GOD ... this three letter word is the ruler of he universe ,ruler of the mind of  every single creature.Not a leaf,as they say ,can move without His will. He defies laws and theorems of science. He is  The Almighty .


BUT......


Who is he ? Is he Rama ,who was born a prince ,brought up in luxury,married a pretty Sita , fought a brutal battle for her,suspected her,and eventually cost her life in course of proving Himself The PURUSHOTTAM??


Is he Allah,who has no displayable face, whose messenger the Prophet Mohammad was a skilled warrior too ,and fought furious battles .


Is He Christ?A lean fellow,who served the poor and finally got crucified for spreading his faith? 


No,they were all common men,who awakened the God inside them.They made their own ways and followed the path explored by themselves.


But we.........we are weakened ,mean,selfish fellows.We worship stones,wear a skullcap,hang down a cross across our chest and hope the blessings of God to be with us,in whatever we do,whether right or wrong.


In fact ,there is nothing like God in this world.Man is his own God.If God was really present,as depicted omnipresent,the world would have been a better place to live in ,with all people happy and no miseries,no injustice.But this is not the case.Good men are killed,cities are burned down by some handful of so called powerful people.Women are not safe even in their own house.


People those who are powerful and rich,praise God  for their power and wealth.Poor ones blame their own God for their misery.


       मान जाऊं मैं उसे ,
       गर दीदार हो कभी |




             पूजते हैं सब जिसे ,
             कहते हैं भगवान  सभी |
        देख लें मेरी निगाहें ,
        तब ज़रा विश्वाश हो |
             छू के गुज़रे नूर उसका ,
             और मुझे एहसास हो ||


                                                      

Monday, 24 May 2010

मौत ,तू नयी ज़िन्दगी है

मौत ,तू नयी ज़िन्दगी है ,
ग़म है नदारद ,तुझमे अनजानी सनसनी है |
बिन कहे किया है वादा तूने  सबसे आने का , 
एक तू ही  है जो सबके लिए बनी है |
मौत , तू नयी ज़िन्दगी है ||


तुझे जानकर भी बनते हैं अनजान सब ,
चुराते हैं नज़रें ,डरते हैं मानो तू  'मिल जाये कब ' |
पर मैं जानता हूँ ,तू  हर कहीं है  |
मौत ,तू नयी ज़िन्दगी है ||


मुझसे मिलने जब तू आना ,
ना आवाज़ करना ,और ना दरवाज़ा खटखटाना ,
जब मैं अपनी ख़्वाबों की दुनिया में खोया रहूँ ,
तू आना और उसी दुनिया में मुझे ले जाना |||

Wednesday, 12 May 2010

हास्य कविता

शहर के पुराने कारागार में ,
कुछ कैदी खड़े थे कतार में |


एक ने सिपाही से पूछा,"क्या मंत्री जी दौरे पर हैं? सुना है मिठाई बंटनी है |"
सिपाही बोला ,"मंत्री जी तो हैं ,पर दौरे पर नहीं ,घोटाले में फंसे हैं ,उनकी सजा यहाँ कटनी है "|


इतना सुनते ही कैदी ख़ुशी से पागल हो गया ,
बोला अब आयेगा जीने का मज़ा |
और जन्नत बन जाएगी मेरी ये दो महीने की सजा |


जिनके लिए मैं जेबें कतरता था ,वो सब सुख मैं अब यहीं पाउँगा ,
दिन भर देखूंगा हिंदी फ़िल्में ,और रात को अंग्रेजी पी के टुन्न हो जाऊंगा |


और बहार जाके क्या मिलेगा मुझे ,
एक बड़ा हाथ मरूँगा और फिर छः  महीने के लिए वापस आऊंगा |


सिपाही भी ताव में आ गया और बोला ,
तू  क्या समझता है ,तेरी ही ऐश है ?
अरे मेरे बैंक में जो जमा है ,वो सब मंत्री जी का कैश है |
और मन्त्रिवर का मुर्गा लेने मैं ही फाइव  स्टार जाता हूँ ,
यहाँ तो एक लाता  हूँ ,पहले दो घर भिजवाता हूँ |


अभी हाल ही की  बात है ,एक मंत्री धोखाधड़ी में अन्दर आये थे ,
बस उसी हफ्ते मैंने अपने दोनों कमरों में कूलर लगवाए थे |


अब मेरे भी हालात सुधर गए हैं ,मैं भी दान -भीख देता हूँ ,
और नेता जी की मन से सेवा करो ,
नए सिपाहियों को यही सीख देता हूँ |

Sunday, 9 May 2010

सीखने की कीमत

सुना था , ठोकर खाने के बाद ही संभलना सीखते हैं ,
पर क्या एक सीख के खातिर ठोकर खाना ज़रूरी है ?


कहते हैं की हार के बाद ही जीत है ,
पर अगर ये हार आंखरी हुई तो ? 
ऐसी सीख का क्या फायदा ?
क्यों न कुछ ऐसा करें की ठोकर   लगे ही ना ,
क्यों ना ऐसे  लड़े की हार मिले ही ना |


एक अदद सीख की कीमत ,एक चोट ,एक हार , क्या ज्यादा नहीं ?
सीखना ही है तो सीखो किसी और की हार से ,किसी और की चोट खाने से |
क्या फायदा उस सीख का जो मिलेगी अपनी जान गवाने से |


पर शायद यही सच भी है ,
क्यों कि मैंने भी सीखा है ,
अपनी ही चोट से ,अपनी ही  हार से |


पर मैं भी कब तक हारता रहूँ ,कब तक चोट खाता रहूँ ?
लड़ाई एक तरह की ही हो तो मैं कुछ  सीखूं |
यहाँ तो हर पल एक नई जंग छिड़ती है ,
हर क्षण एक ठोकर लगती है |


तो क्या मैं घायल होता रहूँ , बस ये जानने के लिए की संभलते कैसे हैं ?
और हारता रहूँ जीत के एक सबक के लिए ??





Thursday, 6 May 2010

यादों की गलियाँ


यादों की इन् गलियों में बहुत आना जाना है मेरा ,
यहीं कुछ घरों में तो अब ठिकाना है मेरा .
    इन्ही यादों के साथ रो लेता हूँ  मैं कभी,
    तो कभी ये यादें हसने का बहाना है मेरा.


जी करता है कल को भुला  के मैं बस आज में जी लूँ ,
पर होके पत्थर-दिल मैं कैसे ये कड़वा घूँट पी लूँ .
    आखिर इन्ही यादों में कैद गुज़रा ज़माना है मेरा ,
     यादों की इन् गलियों में बहुत आना जाना है मेरा.


न जाने कैसे ये साल एक पल में गुज़र जाते हैं ,
कुछ लोग हैं ऐसे जो मुझे बहुत याद आते हैं ,
    दोनों हाथों से लुटा दूँ तो  भी ख़तम न हो ,
    यादों का अनमोल ,कुछ ऐसा खज़ाना है मेरा .


यादों की इन् गलियों में बहुत आना जाना है मेरा!!!!!